1 C
New York
Wednesday, January 25, 2023

आओ नववर्ष का करें अभिनंदन : महाकवि ठाकुर रविंद्र नाथ टैगोर की कविताओं से पाएं जीवन का दर्शन

आज से हर घर में पुराना कैलेंडर दीवार से उतर जाएगा और उसकी जगह नया कैलेंडर ले लेगा। आज से नव वर्ष का स्वागत 2022 कैलेंडर के साथ होगा। दुख सुख के हर लम्हे का पुराना कैलेंडर रद्दी में रख दिया जाएगा, लेकिन कुछ घटनाओं की तारीखें, कुछ आपदाओं के लम्हे और कई खुशियों के पल जो हमने कभी संजोये होंगे याद रहेंगे। चलो ऐसी ही हसीन यादों के साथ नए वर्ष का हम स्वागत करें। आपके नववर्ष के कैलेंडर का पहला दिन खास बनाने के लिए हम आपके लिए साहित्य के चमन से फूल चुनकर लाएं हैं। कुछ ग़ज़लें, कुछ कविताएं। आओ कुछ सुनें और कुछ पढ़ें । आओ पुराने दुखों से अतीत की छाया से आजाद हो जायें और नए समय के आकाश में सपनों की उड़ान भरे। हां, मानव मन कभी अतीत से आजाद नहीं हो पाता । अतीत का मोहपाश ही ऐसा होता है, जो बीत जाता है वो भविष्य के कठिन मोड़ पर सुहाना लगता है। मोहपाश मन पिंजरे की चिड़िया की तरह होता है तो पिंजरे में लौटना चाहती है लेकिन हमें विचरण करना है समय के आकाश का और यही जीवन है, तो चलो नववर्ष के पहले दिन से भेंट करें महाकवि ठाकुर रविंद्रनाथ टैगोर की कविता के साथ।

 

महाकवि ठाकुर रविंद्रनाथ टैगोर की कविताएं

पिंजरे की चिड़िया थी

महाकवि रविंद्रनाथ टैगोर

पिंजरे की चिड़िया थी सोने के पिंजरे में
वन कि चिड़िया थी वन में
एक दिन हुआ दोनों का सामनाक्या था विधाता के मन में

 

वन की चिड़िया कहे सुन पिंजरे की चिड़िया रे
वन में उड़ें दोनों मिलकर
पिंजरे की चिड़िया कहे वन की चिड़िया रे
पिंजरे में रहना बड़ा सुखकर

वन की चिड़िया कहे ना…
मैं पिंजरे में क़ैद रहूँ क्योंकर
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
निकलूँ मैं कैसे पिंजरा तोड़कर

वन की चिड़िया गाए पिंजरे के बाहर बैठे
वन के मनोहर गीत
पिंजरे की चिड़िया गाए रटाए हुए जितने
दोहा और कविता के रीत

वन की चिड़िया कहे पिंजरे की चिड़िया से
गाओ तुम भी वनगीत
पिंजरे की चिड़िया कहे सुन वन की चिड़िया रे
कुछ दोहे तुम भी लो सीख

वन की चिड़िया कहे ना…
तेरे सिखाए गीत मैं ना गाऊँ
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय!
मैं कैसे वनगीत गाऊँ

वन की चिड़िया कहे नभ का रंग है नीला
उड़ने में कहीं नहीं है बाधा
पिंजरे की चिड़िया कहे पिंजरा है सुरक्षित
रहना है सुखकर ज़्यादा

वन की चिड़िया कहे अपने को खोल दो
बादल के बीच, फिर देखो
पिंजरे की चिड़िया कहे अपने को बाँधकर
कोने में बैठो, फिर देखो

वन की चिड़िया कहे ना…
ऐसे मैं उड़ पाऊँ ना रे
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
बैठूँ बादल में मैं कहाँ रे

ऐसे ही दोनों पाखी बातें करें रे मन की
पास फिर भी ना आ पाए रे
पिंजरे के अन्दर से स्पर्श करे रे मुख से
नीरव आँखे सब कुछ कहें रे

दोनों ही एक दूजे को समझ ना पाएँ रे
ना ख़ुद समझा पाएँ रे

दोनों अकेले ही पंख फड़फड़ाएँ
कातर कहे पास आओ रे

वन की चिड़िया कहे ना…
पिंजरे का द्वार हो जाएगा रुद्ध
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
मुझमे शक्ति नही है उडूँ  ख़ुद

विपदाओं से रक्षा करो, यह न मेरी प्रार्थना

विपदाओं से रक्षा करो-
यह न मेरी प्रार्थना,
यह करो : विपद् में न हो भय।
दुख से व्यथित मन को मेरे
भले न हो सांत्वना,
यह करो : दुख पर मिले विजय।
मिल सके न यदि सहारा,
अपना बल न करे किनारा; –
क्षति ही क्षति मिले जगत् में
मिले केवल वंचना,
मन में जगत् में न लगे क्षय।
करो तुम्हीं त्राण मेरा-
यह न मेरी प्रार्थना,
तरण शक्ति रहे अनामय।
भार भले कम न करो,
भले न दो सांत्वना,
यह करो : ढो सकूँ भार-वय।
सिर नवाकर झेलूँगा सुख,
पहचानूँगा तुम्हारा मुख,
मगर दुख-निशा में सारा
जग करे जब वंचना,
यह करो : तुममें न हो संशय।

रोना बेकार है

व्यर्थ है यह जलती अग्नि इच्छाओं की
सूर्य अपनी विश्रामगाह में जा चुका है
जंगल में धुंधलका है और आकाश मोहक है।
उदास आँखों से देखते आहिस्ता क़दमों से
दिन की विदाई के साथ
तारे उगे जा रहे हैं।

तुम्हारे दोनों हाथों को अपने हाथों में लेते हुए
और अपनी भूखी आँखों में तुम्हारी आँखों को
कैद करते हुए,
ढूँढते और रोते हुए, कि कहाँ हो तुम,
कहाँ ओ, कहाँ हो…
तुम्हारे भीतर छिपी
वह अनंत अग्नि कहाँ है…

जैसे गहन संध्याकाश को अकेला तारा अपने अनंत
रहस्यों के साथ स्वर्ग का प्रकाश, तुम्हारी आँखों में
काँप रहा है,जिसके अंतर में गहराते रहस्यों के बीच
वहाँ एक आत्मस्तंभ चमक रहा है।

अवाक एकटक यह सब देखता हूँ मैं
अपने भरे हृदय के साथ
अनंत गहराई में छलांग लगा देता हूँ,
अपना सर्वस्व खोता हुआ।

दिन पर दिन चले गए

दिन पर दिन चले गए पथ के किनारे।
गीतों पर गीत अरे रहता पसारे।।
बीतती नहीं बेला सुर मैं उठाता।
जोड़-जोड़ सपनों से उनको मैं गाता।।
दिन पर दिन जाते मैं बैठा एकाकी।
जोह रहा बाट अभी मिलना तो बाकी।।
चाहो क्या रुकूँ नहीं रहूँ सदा गाता।
करता जो प्रीत अरे व्यथा वही पाता।।

नोट : यह कविताएं नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत महाकवि रविंद्र नाथ टैगोर के काव्य संग्रह गीतांजलि से लीं गई हैं।

प्रस्तुति : एस-अतुल अंशुमाली

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

22,878FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
www.classicshop.club

Latest Articles