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Thursday, September 29, 2022

नववर्ष का पहला साहित्य संडे : हिमाचल के उभरते कहानीकार मनोज कुमार शिव के कहानी संग्रह ‘घर वापसी’ व कविताओं का स्वागत

हिमाचल के साहित्य फलक पर बिलासपुर के नम्होल गांव घ्याल के मनोज कुमार ‘शिव’ बेहतरीन कहानीकार के रूप में चमक रहे हैं। हाल ही में इनका कहानी संग्रह ‘घर वापसी’ प्रकाशित हुआ है। इनकी कहानियों में हिमाचल के पहाड़ी जनजीवन का परिवेश, संघर्ष और विकास की दौड़ में जो पीछे छूट गई संस्कृति व सभ्यता की पीड़ा अनुभव की जा सकती है। वहीं वर्तमान के बदले हुए समाज को लेकर भी यह अपनी कहानियों में सजग लगते हैं। यही कारण है कि मनोज कुमार ‘शिव’ आज बेहतर कहानीकार के रूप में जाने जा रहे हैं। कई बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कहानियां व लघुकथाएं प्रकाशित होती रहती हैं। मनोज कुमार “शिव”

कई पत्र पत्रिकाओं में हो चुका प्रकाशन 

जिला बिलासपुर के नम्होल गांव घ्याल में गोकुल राम ठाकुर के घर 15दिसम्बर ,1986 को जन्मे मनोज कुमार ‘शिव’ ने बी.एस.सी (मेडिकल), एम.बी.ए.(वित एवं मार्केटिंग) किया हैl वर्तमान में  हिमाचल प्रदेश ग्रामीण बैंक में अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं l कई पत्र-पत्रिकाओं बया,पाखी , विश्वगाथा,कथाबिम्ब, परिकथा,सरोपमा ,हिमप्रस्थ, अहाज़िंदगी!, कथादेश,प्रगतिशील साहित्य,जाह्नवी, गिरिराज साप्ताहिकी,अविराम साहित्यिकी,शब्द मंच जैसी विभिन्न पत्र में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं । इसके अलावा दिल्ली से प्रकाशित ‘भारत के प्रतिभाशाली रचनाकार’, ‘हम-तुम’, संपादक जितेंद्र चौहान जी के ‘लघुकथाऐं’में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।  दूरदर्शन, शिमला (हि.प्र.) से कविता पाठ  का प्रसारण एवं हिमाचल प्रदेश में कवि सम्मेलनों में भागीदारी दे चुके हैंl

मनोज कुमार ‘शिव’ की दो कविताएं

पहाड़ी महिलाएं

कहानीकार व कवि मनोज कुमार शिव

पहाड़ और
पहाड़ी
महिलाएं
होते हैं
इक-दूजे के
पर्याय,

पहाड़ी महिलाएं
पहाड़ की
विषम परिस्थितियों में भी
सहर्ष
गाती है जीवन का गीत …

पहाड़
सीखाता है उन्हें
विपत्तियों से
निपटना ,
रह कर
अडिग
उसी की
मानिंद,

पहाड़ी
महिलाएं चढ़ती हैं
संकरी ढ़लानों पर
डंगरों के लिए
चारा लेने हेतु,
पीठ पर
उठाती है
भारी बोझा,

वे
लगती है
किसी अनुभवी पर्वतारोही
के माफिक,
हालांकि वो हैं
डिक्की डोलमा,
बछेन्द्री पाल आदि
नामों से
अनभिज्ञ,

जंगल में
डंगरों को
पत्तियाँ इकट‌्ठा करती हुईं
वे गाती हैं
मधुर स्वरों में
लोक गीत ,
पहाड़ भी संग उनके
गुनगुनाने लगता है …

बेशक
बेजुबान है पहाड़
मगर समझता हैं
उनके हर जज्बात को…

पहाड़ी महिलाऐं
माँगती है
पुरे कुटुंब,
डंगरों ,
गांव-बेड आदि की
सुरक्षा
चोटी पर विराजमान
देवगणों से,

पहाड़
उनके रक्षक हैं,
सुख-दुःख के साथी हैं..

इक-दूजे के बिन
अधूरे हैं
पहाड़ और
पहाड़ की महिलाएं ।।

घर वापसी

गांव के
सामने वाली
पहाड़ी से
उगते सूरज की
सुनहरी किरणों का
आलिंगन पाकर
खुश हो रहा है
रिढ़कू ,

देवदार के
एक पुराने पेड़ के
पास खड़ा
वह,
देख रहा है
नींद से जाग रहे
अपने प्यारे गांव को,

पेड़ों पर
बैठे पंछी
सुना रहे हैं उसे
सुबह का गीत,
उसे हो रहा है
एहसास की वो
पुनः आकर
खड़ा है
अपने
गांव की धरती पर,

ग्रामदेव के मंदिर में
पूजा कर रहे
गुर के द्वारा
फूंके गए
शंख की पावन ध्वनि सुनकर
उसे होने लगा है
विश्वास कि
उसने पा लिया है
वह सब
जिसके लिए
तड़प रहा था वह
पिछले दो महीनों से,
दरअसल
अपने शहरी
बेटे के पास
कुछ दिन लगाकर आया है रिढ़कू ,
मगर शहर न हो
जहन्नुम हो मानो
उसके लिए,
वापस गांव
आकर
उसने महसूस किया है कि
यहीं पर ही जीना
अंतिम सांस तक,
सुकून साफ़ झलक रहा है
उसके चेहरे पर
जैसे
सूखी जमीन पर
तड़पती
मीन को मिल गया हो
नीर !

रिढ़कू
आज बहुत
खुश है।।

शिव नई पीढ़ी के संभावनाशील कथाकार : कहानीकार मुरारी शर्मा

वरिष्ठ कहानीकार मुरारी शर्मा मनोज कुमार शिव के बारे में कहते हैं कि मनोज नई पीढ़ी के संभावनाशील कथाकार हैं। इनकी कहानियों को पढऩे का कई बार असवर मिला है…इन कहानियों से गुजरना दूर-दराज के अंचलों में बसे जनमानस के जीवन से साक्षात्कार करने जैसा है। मनोज बेहद संवेदनशील रचनाकार हैं…और अपने लोक को सूक्ष्मता से पकड़ते ही नहीं बल्कि उसमें डूबकर जीते भी हैं। वे सही मायने में लोकजीवन के कथाकार हैं…और ग्राम्य परिवेश में तेजी से आ रहे बदलाव को न केवल महसूस करते हैं, अपितू आमजनमानस के दर्द का हिस्सा बनकर प्रतिकार भी करते हैं सामाजिक उत्पीडऩ, तिरस्कार, अंधविश्वास और गैर बराबरी से मुक्ति के अलावा मनोज अपनी कहानियों में लोकआख्यान, मिथक और नानी-दादी की लोककथाओं के रूपक भी गूंथते हैं।

मनोज कुमार शिव नई पीढ़ी के ऐसे कथाकार हैं जो लोकजीवन में गहरी पैठ रखते हैं। अपने आसपास हो रहे सामाजिक , आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों को वे ने केवल महसूस करते हैं। बल्कि आमजन के आचार-व्यवहार ,रहन-सहन, बोली-भाषा और समग्र जीवन में हो रहे बदलाव को अपनी रचनाशीलता का हिस्सा बनाते हैं। अपने पहले कथासंग्रह से मनोज हिंदी के विशाल पाठकवर्ग के समक्ष अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं। मनोज की अधिकांश कहानियों का कथानक ग्रामीण परिवेश है…जहां की मिट्टी में लोटपोट होकर, नदी-नालों, हाटघराट, जंगल -देवता के थान आदि में उनका बचपन बीता है…इसी परिवेश से उनकी कहानियों के किरदार सामनं आते हैं। ऐसा भी नहीं उन्होंने शहरी जीवन और महानगरों पर कहानियां नहीं लिखी …मगर यहां तक उनका पहाड़ीपन उनके साथ-साथ यात्रा करता है। मनोज की कहानियों के कथानक और पात्र कल्पनालोक के वासी नहीं होते…अपने आसपास के यथार्थ पर बुने जाते हैं। जिसमें लोकभाषा, कहावतों, मुहावरों, मान्यताओं और जपदीय रस्मों-रिवाज की झलक मिलती है।

प्रस्तुत कहानी संग्रह में उनकी अब तक की बेहतरीन कहानियां संकलित है…जो देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। अपनी इन तमाम खूबियों के चलते यह युवा कथाकार भविष्य के प्रति आश्वसत करता है।
-मुरारी शर्मा।

 

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